नवरात्रि का पाँचवाँ दिन: माँ स्कंदमाता की कथा, मंत्र, भोग और वे रहस्य जो कम लोग जानते हैं
नवरात्रि के पाँचवें दिन पूजी जाने वाली माँ स्कंदमाता कौन हैं, कार्तिकेय के जन्म की कथा, कृत्तिकाओं का रहस्य, पहाड़ों से उनका संबंध, विशुद्ध चक्र, पूजा विधि, मंत्र और भोग, सब एक ही लेख में।
नवदुर्गा के नौ नामों में स्कंदमाता ही ऐसा नाम है जो संतान के नाम से बना है। यानी शक्ति के इस रूप की पहचान उनके पुत्र से है, और उनकी गोद में बैठा बालक ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया। हमारी परंपरा में मातृत्व को कितना ऊँचा स्थान मिला है, यह इस एक नाम से समझ आता है।
नवरात्रि के पाँचवें दिन इन्हीं की पूजा होती है: माँ स्कंदमाता।
पहले दिन नींव, दूसरे दिन अनुशासन, तीसरे दिन निर्भयता, चौथे दिन सृजन, और पाँचवें दिन ममता और पालन। सृजन के बाद उसका संरक्षण।

> "ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः" —
स्कंद कौन हैं?
स्कंद, यानी कार्तिकेय, शिव और पार्वती के पुत्र और देवताओं के सेनापति (देवसेनापति) हैं। उनके कई नाम हैं: कुमार, षण्मुख (छह मुखों वाले), सुब्रह्मण्य, गुह और दक्षिण भारत में मुरुगन। स्कंद पुराण, जो परंपरा में सबसे विशाल पुराण माना जाता है, उन्हीं के नाम पर है।
पूर्वकाल में तारकासुर का अत्याचार बढ़ गया था, और उसका अंत केवल शिव के पुत्र के हाथों हो सकता था। यही कारण था कि पार्वती की तपस्या और शिव से उनका विवाह इतना आवश्यक था। दूसरे दिन की ब्रह्मचारिणी की तपस्या का फल पाँचवें दिन की स्कंदमाता के रूप में सामने आता है।
कार्तिकेय के जन्म की कथा: छह कृत्तिकाएँ, छह मुख
पुराणों की कथाओं में कार्तिकेय के जन्म का वर्णन बड़ा रोचक है, और इसमें कई रूपांतर मिलते हैं।
प्रचलित कथा यह है:
• शिव का तेज इतना प्रबल था कि उसे कोई संभाल नहीं पा रहा था। अग्नि और गंगा के सहयोग से वह तेज शरवण (नरकंडों के वन) में पहुँचा।
• वहाँ से एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, इसलिए उन्हें शरवणभव भी कहा गया।
• छह कृत्तिकाओं ने उनका पालन किया। इसी कारण उन्हें कार्तिकेय कहा जाता है, यानी कृत्तिकाओं का पुत्र।
• कथा के अनुसार, छहों के स्नेह की वजह से उनके छह मुख हुए, और वे षण्मुख कहलाए।
• पार्वती ने उन्हें अपनी गोद में लिया, और वे उसी क्षण से स्कंदमाता कहलाईं।
रोचक तथ्य यह है कि आकाश में दिखाई देने वाला तारा-समूह कृत्तिका (प्लीयडीज़) भारतीय नक्षत्र परंपरा में इन्हीं कृत्तिकाओं से जुड़ा है, और कार्तिक मास का नाम भी कृत्तिका नक्षत्र से ही आया माना जाता है। यानी कथा, आकाश और पंचांग तीनों में इस संबंध की झलक मिलती है।
कथाओं के विवरण ग्रंथों और क्षेत्रों के अनुसार अलग मिलते हैं। यहाँ सबसे प्रचलित रूप दिया गया है।
तारकासुर पर विजय और देवसेनापति
बालक कार्तिकेय को देवताओं ने अपनी सेना का नायक बनाया, और उन्होंने तारकासुर का अंत किया। यानी जिस समस्या का समाधान पार्वती की तपस्या ने संभव बनाया, उसका अंतिम समाधान उनके पुत्र के हाथों हुआ। माँ की तपस्या और पुत्र की वीरता, दोनों एक ही कथा की कड़ियाँ हैं।
स्वरूप के प्रतीक
परंपरागत व्याख्याओं में माँ स्कंदमाता के हर चिह्न का एक अर्थ है:
• गोद में बालक स्कंद: माता की ममता और संरक्षण। शक्ति की सबसे कोमल अभिव्यक्ति।
• कमल का आसन: पवित्रता और अनासक्ति।
• दोनों हाथों में कमल: शुद्धता और सृजनशीलता।
• अभय मुद्रा: शरण में आने वाले की रक्षा।
• सिंह वाहन: मता की सुरक्षात्मक शक्ति। माँ कोमल भी है और संरक्षक भी।
पहाड़ों से स्कंद का नाता: एक और कड़ी
पहले दिन हमने पर्वत और शैलपुत्री की बात की थी। यहाँ वही सूत्र फिर मिलता है। दक्षिण भारत में स्कंद को मुरुगन कहा जाता है, और तमिलनाडु में उनके छह प्रमुख धाम, जिन्हें अरुपडैवीडु कहा जाता है, इन में से कई पहाड़ियों पर हैं, जैसे पलनी, तिरुत्तणी और तिरुपरंकुंद्रम। प्राचीन तमिल परंपरा में मुरुगन को पहाड़ी भूमि (कुरिंजी) का देवता भी माना गया है।
यानी माँ का स्थान ऊँचाई पर, और पुत्र का स्थान भी ऊँचाई पर। यह संयोग नहीं, पर्वत और शक्ति के गहरे नाते का एक और प्रमाण है।
जब पुत्र ने पिता को ॐ का अर्थ सिखाया
यह वह कथा है जो बहुत कम लोग जानते हैं। दक्षिण की परंपरा में एक प्रसंग मिलता है कि बालक मुरुगन ने ब्रह्मा से प्रणव (ॐ) का अर्थ पूछा। ब्रह्मा उत्तर न दे सके तो उन्होंने उन्हें रोक लिया। बाद में शिव को भी उन्होंने ॐ का रहस्य समझाया। इसी कारण उन्हें स्वामीनाथ, यानी "स्वामी (शिव) के भी गुरु", कहा गया, और तमिलनाडु का स्वामीमलई धाम इसी कथा से जुड़ा है।
यह कथा क्षेत्र और ग्रंथ के अनुसार अलग-अलग रूपों में मिलती है, पर इसका संदेश साफ़ है: ज्ञान उम्र या पद का मोहताज नहीं होता, और एक माँ का पुत्र भी गुरु हो सकता है।
विशुद्ध चक्र: वाणी और नाद की शुद्धि
साधना की कई परंपराओं में स्कंदमाता को विशुद्ध चक्र से जोड़ा जाता है। यह कंठ में स्थित पाँचवाँ चक्र माना जाता है, जिसमें सोलह पंखुड़ियाँ, आकाश तत्व और बीज मंत्र "हं" बताया गया है। विशुद्ध का अर्थ है पूरी तरह शुद्ध।
साधना की दृष्टि से यह चक्र वाणी, अभिव्यक्ति और सत्य बोलने की क्षमता का केंद्र माना जाता है। यहाँ फिर नाद की कड़ी जुड़ती है: तीसरे दिन बाहरी घंटे का नाद, चौथे दिन भीतर का अनाहत नाद, और पाँचवें दिन शुद्ध वाणी और ॐ का नाद। अलग-अलग पंथों में चक्रों के क्रम और संबंध भिन्न मिलते हैं, इसलिए इसे साधना-परंपरा की एक व्याख्या के रूप में लें।
केले का भोग: परंपरा में अर्थ
माँ स्कंदमाता को केले का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इससे आरोग्य और शारीरिक बल का आशीर्वाद मिलता है। परंपरा में स्कंदमाता की उपासना को संतान के सुख और रक्षा से भी जोड़ा जाता है, और इसी कारण कई माताएँ इस दिन विशेष श्रद्धा से पूजा करती हैं।
कुछ ज्योतिषीय परंपराओं में स्कंदमाता को बुध ग्रह से जोड़ा जाता है। यह मान्यता क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। कुछ क्षेत्रों में नवरात्रि की पंचमी पर ललिता पंचमी का व्रत भी रखा जाता है।
आज के जीवन में "ममता" का अर्थ
ममता केवल माँ की भावना नहीं है। इसका अर्थ है किसी की देखभाल करना, किसी के विकास में सहारा देना, और बिना शर्त स्नेह देना। पाँचवें दिन आप अपने लिए ऐसा एक संकल्प ले सकते हैं:
• अपनी माँ या घर की किसी बुज़ुर्ग महिला से समय निकालकर बात करें
• बच्चों या छोटों के साथ कुछ देर बिताएँ
• किसी ज़रूरतमंद की छोटी-सी मदद करें
• आज एक दिन मधुर और शुद्ध वाणी का संकल्प लें
• अपने गुरु या शिक्षक को याद करके धन्यवाद कहें
संकल्प छोटा रखें, ताकि वह नौ दिन तक निभ सके। स्कंदमाता की कथा का संदेश यही है कि सच्ची शक्ति में कोमलता भी होती है।
पाँचवें दिन की पूजा: सरल चेकलिस्ट
1. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
2. कलश और माँ की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएँ।
3. फूल, रोली और अक्षत अर्पित करें।
4. केले का भोग लगाएँ।
5. मंत्र का जाप करें।
6. आरती करें।
7. प्रसाद परिवार में बाँटें।
पूजा-विधि में क्षेत्र और परिवार के अनुसार भिन्नता हो सकती है। अपनी परंपरा या पंडित जी के मार्गदर्शन का पालन करें।
ध्यान मंत्र
> ""सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥"" —
> "अर्थ: सिंहासन पर नित्य विराजमान, दोनों हाथों में कमल धारण करने वाली, यशस्विनी स्कंदमाता देवी सदा शुभ फल देने वाली हों।
" —
जाप
> " मंत्र: ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः" —
यह दिन छोड़ना क्यों नहीं चाहिए?
• यह ममता का दिन है। सृजन के बाद उसकी देखभाल, यही जीवन का क्रम है।
• यह माँ और संतान का दिन है। नवदुर्गा में यही एकमात्र नाम है जो संतान से जुड़ा है।
• यह ज्ञान और वाणी का दिन है। शुद्ध वाणी और सच बोलने के संकल्प का अवसर।
• यह पूरे नवरात्रि-चक्र की कड़ी है। पाँचवें दिन की ममता छठे दिन कात्यायनी के शौर्य तक पहुँचती है।
और यदि पूरा विधान संभव न हो, तब भी श्रद्धा से मंत्र का स्मरण और एक छोटा संकल्प परंपरा में सार्थक माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. नवरात्रि के पाँचवें दिन किस देवी की पूजा होती है? माँ स्कंदमाता की, जो नवदुर्गा का पाँचवाँ स्वरूप हैं।
2. माँ स्कंदमाता को क्या भोग लगाएँ? केला।
3. "स्कंदमाता" का क्या अर्थ है? स्कंद (कार्तिकेय) की माता। वे शिव और पार्वती के पुत्र और देवताओं के सेनापति हैं।
4. स्कंदमाता किस चक्र से जुड़ी हैं? साधना परंपरा में उन्हें विशुद्ध चक्र से जोड़ा जाता है।
5. कार्तिकेय को "कार्तिकेय" क्यों कहा जाता है? पुराणों के अनुसार छह कृत्तिकाओं ने उनका पालन किया, इसलिए उन्हें कृत्तिकाओं का पुत्र, यानी कार्तिकेय, कहा गया।
> "माँ स्कंदमाता की कृपा आपके जीवन में ममता, सुरक्षा और ज्ञान लाए। जय माता दी!" —