नवरात्रि का तीसरा दिन: माँ चंद्रघंटा की कथा, मंत्र, भोग और वे रहस्य जो कम लोग जानते हैं
नवरात्रि के तीसरे दिन पूजी जाने वाली माँ चंद्रघंटा कौन हैं, उनके मस्तक पर अर्धचंद्र का अर्थ क्या है, मंदिर के घंटे का रहस्य, मणिपूर चक्र से संबंध, पूजा विधि, मंत्र और भोग, सब एक ही लेख में।
मंदिर में प्रवेश करते ही हम सबसे पहले घंटा बजाते हैं। कभी सोचा है कि यह क्यों? पूजा में घंटा बजाने की परंपरा का एक प्रसिद्ध श्लोक कहता है: "आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु रक्षसाम्।" यानी घंटानाद देवताओं के आवाहन के लिए है और अशुभ शक्तियों को दूर जाने के लिए।
नवरात्रि के तीसरे दिन जिन देवी की पूजा होती है, उनका तो नाम ही इसी घंटे से जुड़ा है: माँ चंद्रघंटा।
पहले दिन नींव रखी गयी, दूसरे दिन अनुशासन और तप की बात हुई, और तीसरे दिन तप का फल सामने आता है: शांति के साथ शक्ति, और निर्भयता।

नाम का अर्थ और उसका संदेश
चंद्रघंटा का अर्थ है वह देवी जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र घंटे के आकार में शोभित है। दिलचस्प बात यह है कि चंद्रमा शीतलता और शांति का प्रतीक है, जबकि घंटे का नाद जागरण और सतर्कता का। एक ही नाम में शांति और शक्ति, दोनों समाए हैं। यही चंद्रघंटा का सबसे बड़ा संदेश है: सौम्यता कमज़ोरी नहीं है, और शौर्य के लिए कठोर होना ज़रूरी नहीं।
शिव की बारात की कथा
लोक-प्रचलित कथाओं में चंद्रघंटा के रूप की उत्पत्ति शिव-पार्वती विवाह से जोड़ी जाती है। कथा यह है कि शिव अपनी अनोखी बारात लेकर पहुँचे, जिसमें भूत-प्रेत, गण और सर्प समाये थे। यह दृश्य देखकर पार्वती की माँ मैना व्याकुल हो गईं और मूच्छित हो गईं। तब पार्वती ने चंद्रघंटा का रूप धारण किया और शिव से अनुरोध किया कि वे सौम्य रूप में आएँ। फिर शिव ने सुंदर रूप धारण किया और विवाह संपन्न हुआ।
यह लोककथा है और प्रत्येक ग्रंथ में इसी रूप में नहीं मिलती, पर इसका भाव स्पष्ट है: जब अस्थिरता और अव्यवस्था सामने हो, तब शांति को संभालने वाली शक्ति सामने आती है।
स्वरूप: सौम्य भी, उग्र भी
प्रचलित वर्णनों में माँ चंद्रघंटा स्वर्ण जैसी आभा वाली हैं। उनके तीन नेत्र और दस भुजाएँ हैं, जिनमें त्रिशूल, गदा, खड्ग, धनुष-बाण जैसे अस्त्र-शस्त्र और कमल व कमंडलु धारण किए हुए दिखाई देते हैं, और एक हाथ अभय मुद्रा में होता है। विवरण क्षेत्र के अनुसार थोड़ा भिन्न मिलता है।
उनकी मुद्रा की विशेषता यह है कि वे शांत बैठी नहीं हैं, बल्कि युद्ध के लिए तत्पर मुद्रा में हैं, पर उनका एक हाथ अभय भी देता है। परंपरागत व्याख्या में इसका अर्थ है: भक्त के लिए वे शांत हैं, और अन्याय के लिए वे उग्र हैं।
• अर्धचंद्र: शीतल मन, संतुलन और विकास की संभावना। अधूरा चाँद भी आगे पूर्ण होता है।
• घंटाकार रूप: अशुभ शक्तियों का नाश और सतर्कता।
• सिंह पर सवारी: निर्भयता और साहस।
• अभय मुद्रा: शरण में आने वाले की रक्षा।
घंटे का रहस्य: पूजा में नाद का महत्व
हिंदू पूजा-पद्धति में घंटानाद का विशेष स्थान है। ऊपर दिए श्लोक के अनुसार इसका उद्देश्य देवताओं का आवाहन और अशुभ का निष्कासन माना गया है। परंपरा में घंटे के नाद को ओंकार के नाद से भी जोड़ा जाता है।
साधारण भाषा में कहें तो घंटे की आवाज़ मन की भागदौड़ को एक क्षण के लिए रोक देती है और ध्यान को एक जगह लाती है। इसलिए जब आप अगली बार मंदिर में घंटा बजाएँ, तो उसके बाद एक साँस के लिए ठहर जाइए। यही चंद्रघंटा की उपासना का सरल रूप है।
मणिपुर चक्र: भीतर की अग्नि
साधना की कई परंपराओं में चंद्रघंटा को मणिपुर चक्र से जोड़ा जाता है। यह नाभि के पास स्थित तीसरा चक्र माना जाता है, जिसमें दस पंखुड़ियाँ, अग्नि तत्व और बीज मंत्र "रं" बताया गया है। मणि का अर्थ है रत्न और पुर का अर्थ है नगर, यानी "रत्नों का नगर"।
साधना की दृष्टि से यह चक्र आत्मविश्वास, इच्छाशक्ति और निर्णय लेने की क्षमता का केंद्र माना जाता है। पहला चक्र स्थिरता देता है, दूसरा संयम सिखाता है, और तीसरा उस संयम को साहस में बदलता है। यहाँ एक रोचक संतुलन भी दिखता है: चक्र अग्नि का है, पर देवी के मस्तक पर चंद्रमा की शीतलता है। यानी शक्ति के साथ शांति। अलग-अलग पंथों में चक्रों के क्रम और संबंध भिन्न मिलते हैं, इसलिए इसे साधना-परंपरा की एक व्याख्या के रूप में लें।
खीर का भोग: परंपरा में अर्थ
माँ चंद्रघंटा को खीर या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इससे कष्टों से मुक्ति और मन की शांति का आशीर्वाद मिलता है। दूध को परंपरा में चंद्रमा की शीतलता और पवित्रता से जोड़ा गया है, इसलिए चंद्रमा धारण करने वाली देवी को दूध का भोग स्वाभाविक माना जाता है।
कुछ ज्योतिषीय परंपराओं में चंद्रघंटा को शुक्र ग्रह से जोड़ा जाता है। यह मान्यता क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
आज के जीवन में "निर्भयता" का अर्थ
निर्भयता का अर्थ डर का न होना नहीं है। इसका अर्थ है डर के बावजूद सही काम करना। चंद्रघंटा की कथा हमें यही सिखाती है कि बिना क्रोध के भी दृढ़ रहा जा सकता है। इस दिन आप अपने लिए ऐसा एक छोटा संकल्प ले सकते हैं:
• जिस काम को डर से टाल रहे हैं, उसका पहला छोटा कदम उठाएँ
• किसी गलत बात पर शांत स्वर में अपनी बात रखें
• घबराहट में निर्णय लेने से पहले एक गहरी साँस लें
• रोज़ कुछ मिनट घंटे या मंत्र की ध्वनि के साथ शांत बैठें
• विद्यार्थियों के लिए: परीक्षा या प्रस्तुति से पहले मंत्र का स्मरण
तीसरे दिन की पूजा: सरल चेकलिस्ट
1. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
2. कलश और माँ की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएँ।
3. फूल, रोली और अक्षत अर्पित करें।
4. खीर या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएँ।
5. मंत्र का जाप करें।
6. घंटा बजाते हुए आरती करें।
7. प्रसाद परिवार में बाँटें।
पूजा-विधि में क्षेत्र और परिवार के अनुसार भिन्नता हो सकती है। अपनी परंपरा या पंडित जी के मार्गदर्शन का पालन करें।
ध्यान मंत्र
> ""पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥"" —
> "अर्थ: जो श्रेष्ठ पशु (सिंह) पर आरूढ़ हैं, प्रचंड क्रोध और अस्त्रों से युक्त हैं, वे चंद्रघंटा नाम से प्रसिद्ध देवी मुझ पर कृपा करें।
"
> "जाप मंत्र: ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः" —
यह दिन छोड़ना क्यों नहीं चाहिए?
• यह निर्भयता का दिन है। अनुशासन के बाद साहस ही उसे दिशा देता है।
• यह सिखाता है कि शांति और शक्ति साथ चल सकती हैं। चंद्रमा और अस्त्र, एक ही स्वरूप में।
• यह नाद का दिन है। घंटे की ध्वनि मन को ठहराव देती है, और यही दिन इस परंपरा की याद दिलाता है।
• यह पूरे नवरात्रि-चक्र की कड़ी है। तीसरे दिन की निर्भयता चौथे दिन की सृजन-शक्ति की ओर ले जाती है।
और यदि पूरा विधान संभव न हो, तब भी श्रद्धा से मंत्र का स्मरण और एक छोटा संकल्प परंपरा में सार्थक माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. नवरात्रि के तीसरे दिन किस देवी की पूजा होती है? माँ चंद्रघंटा की, जो नवदुर्गा का तीसरा स्वरूप हैं।
2. माँ चंद्रघंटा को क्या भोग लगाएँ? खीर या दूध से बनी मिठाइयाँ।
3. "चंद्रघंटा" नाम का क्या अर्थ है? मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र धारण करने वाली। चंद्र का अर्थ चाँद और घंटा का अर्थ घंटा।
4. चंद्रघंटा किस चक्र से जुड़ी हैं? साधना परंपरा में उन्हें मणिपुर चक्र से जोड़ा जाता है।
5. अगर तिथि घट-बढ़ जाए तो पूजा कैसे करें? पंचांग में तिथियों के घटने-बढ़ने से कभी-कभी दो देवियों की पूजा एक ही दिन आ सकती है। अपने स्थान के पंचांग या पंडित जी से परामर्श लें।
> "माँ चंद्रघंटा की कृपा आपके जीवन में शांति, साहस और निर्भयता लाए। जय माता दी!"