नवरात्रि का चौथा दिन: माँ कूष्मांडा की कथा, मंत्र, भोग और वे रहस्य जो कम लोग जानते हैं
नवरात्रि के चौथे दिन पूजी जाने वाली माँ कूष्मांडा कौन हैं, उनके नाम के तीन अर्थ, सृष्टि की उनकी कथा, सूर्यमंडल में निवास का रहस्य, अनाहत चक्र, पूजा विधि, मंत्र और भोग, सब एक ही लेख में।
जब कुछ नहीं था, न प्रकाश, न समय, न ब्रह्मांड, तब क्या था? ऋग्वेद का नासदीय सूक्त सृष्टि से पहले के इसी रहस्य पर प्रश्न उठाता है और अंधकार में छिपे अंधकार का चित्र खींचता है। देवी परंपरा इस प्रश्न का एक सुंदर उत्तर देती है: एक मुस्कान।
नवरात्रि के चौथे दिन उसी मुस्कान की देवी की पूजा होती है: माँ कूष्मांडा।
पहले दिन नींव, दूसरे दिन अनुशासन, तीसरे दिन निर्भयता, और चौथे दिन सृजन। निर्माण की वह मूल शक्ति, जिससे सब कुछ शुरू हुआ।

> "ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः"
"कूष्मांडा" नाम के तीन अर्थ
यह नाम तीन स्तरों पर समझा जाता है, और यही इसकी सबसे रोचक बात है:
1. सृष्टिकर्त्री अर्थ:
परंपरागत व्याख्या में कु का अर्थ छोटा, ऊष्मा का अर्थ ऊर्जा या ताप, और अंड का अर्थ ब्रह्मांडीय अंडा माना जाता है। यानी वह देवी जिन्होंने अपनी ऊष्मा से सृष्टि के अंड को जन्म दिया।
2. भाषाई अर्थ:
ब्रह्मांड शब्द खुद ब्रह्म और अंड से मिलकर बना है, यानी "ब्रह्म का अंडा।" ऋग्वेद के हिरण्यगर्भ सूक्त में भी सृष्टि के आरंभ में एक स्वर्णिम गर्भ का वर्णन है।
3. फल का अर्थ:
कूष्मांड कुम्हड़े (पेठे वाले फल) का नाम भी है। परंपरा में कुम्हड़े को देवी को प्रिय और बलि का सात्विक विकल्प माना गया है।
> "तीनों अर्थ एक ही भाव की ओर ले जाते हैं: सृष्टि की मूल शक्ति।"
सृष्टि की कथा: अंधकार से प्रकाश तक
परंपरा के अनुसार, जब चारों ओर केवल अंधकार था और सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब माँ कूष्मांडा ने अपनी मंद और हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इसी कारण उन्हें आदिशक्ति कहा जाता है।
ऋग्वेद का नासदीय सूक्त भी सृष्टि से पहले के अंधकार का वर्णन करता है, पर यह देवी की कथा से सीधा जुड़ा हुआ नहीं है। फिर भी भाव समान है: शून्य से सृजन, और अंधकार से प्रकाश।
कई लोग इस कथा की तुलना आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान की महाविस्फोट की अवधारणा से करते हैं। यह तुलना काव्यात्मक है, वैज्ञानिक प्रमाण नहीं। दोनों अलग-अलग ढंग से सृष्टि के आरंभ को समझने की कोशिश हैं।
सूर्यमंडल में निवास का रहस्य
परंपरा मानती है कि माँ कूष्मांडा सूर्यमंडल के भीतर निवास करती हैं, और केवल उनमें ही वह सामर्थ्य है कि वे उस तेज के भीतर रह सकें। उनके शरीर की कांति सूर्य के समान तेजस्वी बताई जाती है। इसी कारण कई परंपराओं में उन्हें सूर्य की अधिष्ठात्री कहा जाता है।
इसका सरल अर्थ यह है कि जहाँ सूर्य की तेज अग्नि है, वहाँ भी देवी की शक्ति है, और वह शक्ति अंधकार के विपरीत प्रकाश की है।
स्वरूप के प्रतीक
परंपरागत व्याख्याओं में माँ कूष्मांडा के हर चिह्न का एक अर्थ है:
• आठ भुजाएँ: आठों दिशाओं में उनकी शक्ति का विस्तार।
• अमृत कलश: जीवन और आरोग्य का संकेत।
• जपमाला: सिद्धियों और निधियों की दाता।
• चक्र और गदा: धर्म की रक्षा और अन्याय पर नियंत्रण।
• कमल: सृजन और पवित्रता।
• सिंह: निर्भयता, जो सृजन के लिए ज़रूरी है।
अनाहत चक्र: बिना आघात की ध्वनि
साधना की कई परंपराओं में कूष्मांडा को अनाहत चक्र से जोड़ा जाता है। यह हृदय के पास स्थित चौथा चक्र माना जाता है, जिसमें बारह पंखुड़ियाँ,
वायु तत्व और बीज मंत्र "यं" बताया गया है
> "। अनाहत का अर्थ है "जिस पर आघात न हुआ हो।""
यहाँ एक सुंदर कड़ी है। नाद-योग की परंपरा में दो तरह की ध्वनियाँ मानी गई हैं: आहत नाद, जो टकराने से उत्पन्न होती है, जैसे तीसरे दिन का घंटा, और अनाहत नाद, जो बिना किसी टकराव के भीतर उठती है। यानी तीसरे दिन हमने बाहर की ध्वनि का स्मरण किया, और चौथे दिन भीतर की ध्वनि का।
साधना की दृष्टि से अनाहत चक्र प्रेम, करुणा और संतुलन का केंद्र माना जाता है। सृजन की शक्ति भी तभी सार्थक होती है जब उसके मूल में करुणा हो। अलग-अलग पंथों में चक्रों के क्रम और संबंध भिन्न मिलते हैं, इसलिए इसे साधना-परंपरा की एक व्याख्या के रूप में लें।
मालपुआ और कुम्हड़े का भोग: परंपरा में अर्थ
माँ कूष्मांडा को मालपुआ का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इससे बुद्धि और निर्णय-क्षमता में वृद्धि होती है। कई परिवार इस दिन कुम्हड़े (पेठे) से बनी चीज़ें भी अर्पित करते हैं, जो देवी के नाम से जुड़ा है। आयुर्वेद की परंपरा में कूष्मांड को शीतल और पौष्टिक माना गया है।
परंपरा में माँ कूष्मांडा की उपासना से रोग-शोक का नाश और आयु, यश, बल तथा आरोग्य की वृद्धि का आशीर्वाद माना जाता है। कई परंपराओं में उन्हें सूर्य से भी जोड़ा जाता है, और इसी कारण कई परिवार इस दिन सूर्य को जल अर्पित करते हैं। ये मान्यताएँ क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती हैं।
आज के जीवन में "सृजन" का अर्थ
सृजन का अर्थ केवल कला या निर्माण नहीं है। इसका अर्थ है कुछ नया शुरू करने का साहस, अपनी ऊर्जा को सही दिशा देना, और अपने भीतर की शुरुआत की शक्ति को पहचानना। परंपरा में मुस्कान को भी सृजन की शक्ति का रूप माना गया है।
चौथे दिन आप अपने लिए ऐसा एक संकल्प ले सकते हैं:
• जिस काम को शुरू करना चाहते हैं, उसका पहला छोटा कदम उठाएँ
• सुबह कुछ देर सूर्य के प्रकाश में बिताएँ
• एक पौधा लगाएँ या किसी पौधे की देखभाल करें
• दिन में एक बार किसी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें
• रोज़ कुछ नया सीखने या रचने के लिए थोड़ा समय निकालें
संकल्प छोटा रखें, ताकि वह नौ दिन तक निभ सके। कूष्मांडा की कथा का संदेश यही है कि हर बड़ी रचना एक छोटी शुरुआत से होती है।
चौथे दिन की पूजा: सरल चेकलिस्ट
1. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। हो सके तो सुबह सूर्य को जल अर्पित करें।
2. कलश और माँ की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएँ।
3. फूल, रोली और अक्षत अर्पित करें।
4. मालपुआ या कुम्हड़े से बने प्रसाद का भोग लगाएँ।
5. मंत्र का जाप करें।
6. आरती करें।
7. प्रसाद परिवार में बाँटें।
पूजा-विधि में क्षेत्र और परिवार के अनुसार भिन्नता हो सकती है। अपनी परंपरा या पंडित जी के मार्गदर्शन का पालन करें।
ध्यान मंत्र
> ""सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥"" — Editorial Board
भावार्थ: कमल जैसे हाथों में जीवन-रस से भरा कलश धारण करने वाली कूष्मांडा देवी मेरे लिए शुभ फल देने वाली हों। श्लोक के शब्दार्थ पर अलग-अलग टीकाएँ मिलती हैं, इसलिए पंडित जी से इसका पाठ और अर्थ समझ लेना उचित है।
> "जाप मंत्र: ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः" —
यह दिन छोड़ना क्यों नहीं चाहिए?
• यह सृजन का दिन है। नींव, अनुशासन और निर्भयता के बाद अब निर्माण की बारी है।
• यह सिखाता है कि हर शुरुआत छोटी होती है। ब्रह्मांड की कथा भी एक मुस्कान से शुरू होती है।
• यह प्रकाश का दिन है। अंधकार के मध्य से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश।
• यह पूरे नवरात्रि-चक्र की कड़ी है। चौथे दिन का सृजन पाँचवें दिन स्कंदमाता की ममता तक पहुँचता है।
और यदि पूरा विधान संभव न हो, तब भी श्रद्धा से मंत्र का स्मरण और एक छोटा संकल्प परंपरा में सार्थक माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. नवरात्रि के चौथे दिन किस देवी की पूजा होती है? माँ कूष्मांडा की, जो नवदुर्गा का चौथा स्वरूप हैं।
2. माँ कूष्मांडा को क्या भोग लगाएँ? मालपुआ, और परंपरा के अनुसार कुम्हड़े (पेठे) से बनी चीज़ें।
3. "कूष्मांडा" का क्या अर्थ है? परंपरा में इसके तीन अर्थ मिलते हैं: अपनी ऊष्मा से अंड (ब्रह्मांड) की रचना करने वाली, ब्रह्मांड शब्द से जुड़ा अर्थ, और कुम्हड़े का फल।
4. कूष्मांडा किस चक्र से जुड़ी हैं? साधना परंपरा में उन्हें अनाहत चक्र से जोड़ा जाता है।
5. कूष्मांडा सूर्यमंडल में क्यों रहती हैं? परंपरा में माना जाता है कि सूर्य के तेज के भीतर रहने की सामर्थ्य केवल उन्हीं में है। यह उनकी असीम ऊर्जा का प्रतीक है।
> "माँ कूष्मांडा की कृपा आपके जीवन में नई शुरुआत, ऊर्जा और आरोग्य लाए। जय माता दी!"