हरियाली तीज: सावन की हरियाली में बसा आस्था, प्रेम और परंपरा का पर्व
पिछले साल तीज के एक दिन पहले मेरी नानी अपनी पुरानी चक्की निकाल कर आँगन में बैठ गई थीं। मैंने पूछा — "नानी, आज ही क्यों?" तो हँसते हुए बोलीं, "बेटा, तीज से पहले पिंडा पासना पड़ता है, वरना त्योहार अधूरा रह जाता है।" उसी दिन समझ आया कि तीज सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि दादी-नानी से चली आ रही उन छोटी-छोटी रस्मों का सिलसिला है, जो आज भी हमारे घरों को आपस में जोड़े रखती हैं।
सावन का महीना आते ही चारों ओर हरियाली छा जाती है। पेड़-पौधों पर नई कोंपलें फूटती हैं, रिमझिम बारिश मिट्टी की सुगंध बिखेरती है, और इसी मनभावन मौसम में आता है महिलाओं का सबसे प्रिय पर्व — हरियाली तीज। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, प्रेम, आस्था और सामाजिक एकता का सुंदर संगम है।

तीज क्या है?
"तीज" शब्द तृतीया तिथि से बना है। हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष में मुख्य रूप से तीन तीज मनाई जाती हैं —
हरियाली तीज — श्रावण मास की शुक्ल पक्ष तृतीया
कजरी तीज (बूढ़ी तीज) — भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष तृतीया
हरतालिका तीज — भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष तृतीया
इनमें हरियाली तीज सावन की हरियाली से जुड़ी होने के कारण सबसे उत्सवमय मानी जाती है। यह उत्तर भारत — विशेष रूप से राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार — में बड़े उत्साह से मनाई जाती है।
हरियाली तीज का पौराणिक महत्व
मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए 108 जन्मों तक कठोर तपस्या की थी। अंत में शिवजी ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। यह मिलन श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन हुआ माना जाता है। इसीलिए यह दिन शिव-पार्वती के अखंड प्रेम और समर्पण का प्रतीक बन गया।
इसी कारण विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए, तथा कुंवारी कन्याएं योग्य वर की कामना से इस दिन व्रत और पूजन करती हैं।

तीज क्यों महत्वपूर्ण है?
1. प्रेम और समर्पण का संदेश
तीज हमें सिखाती है कि रिश्ते धैर्य, विश्वास और समर्पण से बनते हैं। शिव-पार्वती का आदर्श आज भी दांपत्य जीवन के लिए प्रेरणा है।
2. प्रकृति से जुड़ाव
सावन की हरियाली, झूले, पेड़ों पर पड़ी डोरियां — यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता सिखाता है। हरा रंग नवजीवन, समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक है।
3. महिलाओं का अपना उत्सव
तीज महिलाओं को अपनी सहेलियों, बहनों और परिवार की स्त्रियों के साथ खुलकर हंसने, गाने, झूलने और खुशियां बांटने का अवसर देती है। पारंपरिक रूप से यह वह दिन होता है जब विवाहित बेटियां मायके आती हैं।
4. सामाजिक और सामुदायिक एकता
सामूहिक झूला, तीज गीत, मेले और शोभायात्राएं समाज के लोगों को एक साथ लाती हैं। यह पर्व हमारी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम भी है।
तीज की परंपराएं और रीति-रिवाज
सिंजारा (सिंधारा)
तीज से एक दिन पहले मायके से बेटी के ससुराल सिंजारा भेजा जाता है — जिसमें मेहंदी, चूड़ियां, वस्त्र, श्रृंगार का सामान, घेवर और मिठाइयां शामिल होती हैं। सास द्वारा बहू को भी सिंजारा दिया जाता है।
पिंडा पासना — एक भूली-बिसरी मगर ज़रूरी रस्म
तीज से पहले कई घरों में आज भी "पिंडा पासना" यानी हाथ की चक्की पर गेहूं या जौ पीसने की परंपरा निभाई जाती है। पहले के समय में यह सिर्फ अनाज पीसने का काम नहीं था — घर की महिलाएं, सास-बहू-बेटियां मिलकर चक्की चलातीं, साथ में तीज के गीत गातीं और अगले दिन के व्रत-पूजन के लिए सामग्री तैयार करतीं। यह रस्म सामूहिक श्रम और आपसी जुड़ाव का प्रतीक थी — एक तरह से त्योहार की तैयारी को भी उत्सव जैसा बना देती थी। आज भले ही ज़्यादातर घरों में चक्की की जगह मिक्सर आ गया हो, पर कई परिवार अब भी सांकेतिक रूप से यह रस्म निभाते हैं, ताकि पुरानी परंपरा जीवित रहे।
सत्तू के लड्डू का महत्व
तीज के पकवानों में घेवर जितना ही महत्व सत्तू के लड्डुओं का भी है, खासकर उन घरों में जहां पिंडा पासने की परंपरा निभाई जाती है — क्योंकि यही पिसा हुआ अनाज आगे चलकर सत्तू बनता है। भुने चने या जौ को घर पर ही पीसकर, उसमें घी, गुड़ और कभी-कभी सोंठ-इलायची मिलाकर लड्डू बनाए जाते हैं। मान्यता है कि यह प्रसाद माता पार्वती को अर्पित करने के बाद ही परिवार में बांटा जाता है। सत्तू ठंडी तासीर का होता है, इसलिए सावन की उमस भरी गर्मी में यह शरीर को राहत भी देता है — यानी यह रस्म सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक समझ से भी जुड़ी है। कई इलाकों में सत्तू के लड्डू या सत्तू का शरबत व्रत खोलने के लिए भी विशेष रूप से बनाया जाता है।
मेहंदी और श्रृंगार
महिलाएं हाथों-पैरों में मेहंदी रचाती हैं, हरी चूड़ियां पहनती हैं और हरे रंग की साड़ी या लहंगा धारण करती हैं। सोलह श्रृंगार करना इस दिन शुभ माना जाता है।
झूला (हिंडोला)
पेड़ों की डालियों या घर के आँगन में झूले डाले जाते हैं। महिलाएं झूला झूलते हुए पारंपरिक तीज गीत गाती हैं। कई जगह मंदिरों में शिव-पार्वती की प्रतिमाओं को भी झूले में विराजमान किया जाता है।

व्रत और पूजन विधि
प्रातः स्नान कर स्वच्छ (प्रायः हरे) वस्त्र धारण करें
पूजा स्थल पर शिव, पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें
मिट्टी या बालू से शिवलिंग बनाकर पूजन की परंपरा भी है
बेलपत्र, धतूरा, दूध, गंगाजल, अक्षत, पुष्प और धूप-दीप अर्पित करें
माता पार्वती को सुहाग सामग्री — चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी — चढ़ाएं
तीज कथा का पाठ या श्रवण करें
आरती के बाद प्रसाद (सत्तू के लड्डू सहित) वितरित करें और संध्या पूजन के बाद व्रत खोलें
तीज गीत और लोकनृत्य
"सावन का महीना…" जैसे लोकगीत, बन्ना-बन्नी, और समूह में गाए जाने वाले तीज गीत इस पर्व की आत्मा हैं। राजस्थान में तीज की भव्य शोभायात्रा (तीज माता की सवारी) प्रसिद्ध है।
आज के समय में तीज का अर्थ
आज जब ज़्यादातर काम मशीनों और बाज़ार ने आसान कर दिए हैं, पिंडा पासने या घर पर सत्तू बनाने जैसी रस्में भले ही कम होती जा रही हों, पर जिन घरों में ये अब भी निभाई जाती हैं, वहां तीज का असली रंग नज़र आता है — नानी-दादी की चक्की की आवाज़, साथ में गाया जाने वाला गीत, और उसी मेहनत से बना प्रसाद। यह पर्व हमें ठहरकर अपनों के साथ समय बिताने और परंपराओं को सिर्फ याद नहीं, बल्कि जीने का मौका देता है।
आइए, इस तीज पर हम अपने घर-परिवार और समाज की महिलाओं के साथ मिलकर यह पर्व मनाएं, अपनी बेटियों को इसकी कथा और रस्मों का महत्व बताएं, और चाहे एक शाम के लिए ही सही — चक्की चलाकर, सत्तू के लड्डू बनाकर, एक तीज गीत गाकर इस परंपरा को जीवित रखें।
तीज की हार्दिक शुभकामनाएं! 🌿